सरकारी मंडी में धान बेचना है तो महीनों इंतजार करना पड़ेगा किसानों को

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे हुए जिले बाराबंकी में किसानों का संघर्ष खत्म होते नहीं दिख रहा है. मुख्य तौर पर धान की खेती करने वाले किसान अपनी धान की फसल के लिए उचित दाम ना मिलने से परेशान हैं. सरकारी क्रय केंद्रों में किसान महीने महीने भर से अपने धान से लदे ट्रैक्टर लेकर बैठे हुए हैं. इसके अलावा भी किसानों की आवारा पशु, पराली से होने वाली अव्यवस्था, अगली फसल बोने में लगने वाले धन की किल्लत जैसी अनेक समस्याएं हैं जिन पर प्रसाशन की तरफ से कोई मदद या दिशानिर्देश जैसी सहूलियत भी नहीं मिल रही है.

क्या है धान खरीद की समस्या?
बाराबंकी जिले की नवीन कृषि मंडी धान खरीद के लिए सरकारी क्रय केंद्र है. बाराबंकी के साथ साथ आस पास के जिलों के छोटे बड़े किसान इसी मंडी में आकर अपनी फसल बेचते हैं. लेकिन मंडी में इंतजार कर रहे किसानों की शिकायत है कि उन्हें जो टोकन नंबर दिया गया है, उसके अनुसार उनकी धान बेचने की बारी जनवरी, फरवरी 2021 तक का समय लग सकता है.
धान के तौले जाने का इंतज़ार करने के अलावा किसानों के पास केवल एक विकल्प है – निजी व्यापारी को अपनी फसल बेचना. लेकिन निजी व्यापारी किसानों को धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी कम पैसे देते हैं. सरकार ने प्रति क्विंटल धान के लिए 1888 रूपए तय किए हैं, वहीं निजी व्यापारी प्रति क्विंटल के मात्र 1000 से 1100 रूपए तक ही देते हैं. ऐसे में किसानों को अंततः घाटा हो रहा है.

अगली फसल के लिए धन राशि कहां से लाएं किसान?
हम सब जानते हैं कि देश के किसानों की माली हालत कितनी कमजोर है. ज्यादातर किसान फसल बोने के पहले छोटे बैंकों औऱ साहूकारों से कर्ज लेकर फसल तैयार करते हैं. उस फसल को बेच कर प्राप्त पैसों से अगली फसल की तैयारी, घर-गृहस्थी, कर्ज चुकाने जैसे सारे काम करते हैं. लेकिन जब सरकारी मंडियों में फसल बिक ही नहीं रही तो किसान हार कर मजबूरी में निजी व्यवसायियों को फसल बेच रहे हैं.

निजी व्यापारियों और बिचौलियों की सांठ-गांठ से त्रस्त किसान.
किसान यूनियन के उपाध्यक्ष से बातचीत में उन्होंने कहा कि,
“किसानों को जानबूझ कर सरकारी मंडी से ऐसे टोकन दिए जा रहे हैं जो कि महीनों बाद के हैं. दिवाली के बाद से लगन शुरू है. किसी के घर बेटी की शादी है तो किसी के घर बहन की. अब ऐसे में उन्हें पैसों की जरूरत है तो किसान तो जाएंगें ही निजी व्यापारियों के पास. ”
उपाध्यक्ष ने आगे सरकारी मंडी के कर्मचारियों औऱ अधिकारियों की बिचौलियों से मिली भगत की तरफ इशारा करते हुए कहा कि,
“ जब किसान अपनी फसल निजी व्यापारियों को बेच ही देता है, तब वही फसल बिचौलियों की मदद से सरकारी दाम में, जो कि 1888 है, सरकारी मंडियों में बेच दिया जाता है. किसान गरीब हैं, उनकी सरकारी कार्यालयों में पहुंच नहीं है, बस इसी वजह से वो अपनी मेहनत से उगाई हुई फसल के लिए पर्याप्त पैसे तक नहीं पा रहे हैं. ”

आवारा पशुओं की समस्या में भी सरकार की कोई सहायता नहीं
बाराबंकी जिले के जेवली गांव में रहने वाले जयसिंह वर्मा ने बताया कि,
“आवारा पशुओं से लोग इतने परेशान हैं कि दिन दिन भर खेतों में पहरेदारी करनी पड़ती है. थोड़े समय के लिए भी खेत छोड़ आओ तो फसल बर्बाद मिलती है. इससे बचने का रास्ता या तो पहरेदारी है, या तो तारों से खेतों का घेराव कर देना. दोनों ही किसानों के लिए मुश्किल है. हमें वैसे भी अपनी फसल का दाम नहीं मिलता, हम कहां से लाएं पैसे तार लगवाने के लिए. सरकार अगर गोशाला जैसी व्यवस्था सुनिश्चित करदे, तो हमारी सहायता हो जाएगी.”

किसानों को पराली दो – खाद लो स्कीम से अनजान…
बाराबंकी डी.एम ने कुछ दिन पहले ही किसानों की पराली की समस्या हल करने के लिए पराली दो – खाद लो स्कीम की घोषणा की थी. इस स्कीम के मुताबिक किसानों को हर दो बोरे पराली पर 1 बोरा खाद मिलना था. लेकिन सरकारी मंडी से लेकर गांवों तक में जितने किसानों से बात की गई, किसी को भी ऐसी किसी योजना के बारे में कुछ पता ही नहीं था.
किसानों से जब पराली पर प्रश्न किया गया तब उनका कहना था कि पराली जलाई तो जेल जाना पड़ेगा, इसलिए पराली काटकर बस इधर उधर रखे हुएं हैं. जिन किसानों के घर मवेशी हैं, वहां तो फिर भी थोड़ी बहुत पराली उपयोग में आ जाती है. बाकी सिर्फ बर्बाद हो रही है.

योगी सरकार के कानों में जूं भी नहीं रेंग रही
किसानों की बदहाली पर योगी सरकार ऐसे बयान और ट्वीट करती है जैसे सबकुछ ठीक है. योगी हैदराबाद और मुंबई जा रहे, बनारस में देव दीपावली मना रहे. लेकिन गांवों में जाकर, किसानों के बीच जाकर कुछ और ही स्थिति सामने आती है. ऐसे में इतना साफ है कि सरकार सीधे सीधे किसानों की समस्याओं को नकार रही है, और किसी तरह का हल नहीं दे रही. किसान को अन्नदाता, अर्थव्यवस्था की रीढ़ जैसी उपमाओं के अलावा सरकार से कुछ भी नहीं मिल रहा है. किसान भी ये समझ चुके हैं कि इस सरकार को अब उनकी याद केवल चुनावों के पहले ही आएगी.
किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य ना देना अन्याय है. सरकार ये बात शायद नकारती ही रहेगी. लेकिन अपने इस कठिन समय को किसान नहीं भूलेंगे. किसान याद रखेंगे कि जब दुनिया में महामारी का दौर था, और देश की अर्थव्यवस्था अपने सबसे बुरे दिन देख रही थी, तब सरकार ने गरीब किसानों हक मार के पूंजीपतियों की जेबें भरी थीं.

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