भारत-पाकिस्तान युद्ध में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की ऐतिहासिक विदेश नीति की कुछ विशेषताएं, जो आपने कभी नहीं सुनी होगी

पाकिस्तान के साथ 1971 के  युद्ध में इंदिरा गाँधी की विदेश निति का अहम योगदान था। जो आगे चल कर निर्णायक बना।

दरअसल अमेरिका लगातार पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था। उसने पाकिस्तान को हथियार और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग समर्थन दिया।

इस क्रम में इंदिरा गाँधी ने रूस के साथ एक आर्मी ट्रीटी की । जिसमें दोनों देश एक दूसरे की वॉर की स्थिति में सहायता करेंगे।

रूस के साथ इस समझौते ने अपना कमाल दिखाया। 06 दिसंबर को इंदिरा गाँधी ने संसद में बांग्लादेश को मान्यता दे दी। अमेरिका पाकिस्तान के साथ वह युद्ध विराम चाहता था। जिसके लिए वह UN चला गया लेकिन रूस ने भारत का साथ देते हुए UN की सिक्योरिटी कॉउंसिल में वीटो का प्रयोग करके प्रस्ताव खारिज करवा दिया।

अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन को मोहरा बनाया, अमेरिका ने भारत को घेरने के लिए चीन से भारत के खिलाफ खड़े होने की अपील की, लेकिन वहां भी असफल रहा। 07 दिसंबर को अमेरिका ने पाकिस्तान की सहायता करने के लिए अपने सातवीं जंगी बड़े को बंगाल की खाड़ी में भेजा। यह USS एंटरप्राइज़ का शक्तिशाली बेडा था। इसमें एक साथ 7 बड़े जहाज चलते थे। पाकिस्तान की सहायता करने के लिए ब्रिटैन ने अपना ईगल भी भेजा था।

इंदिरा गाँधी ने रक्षा समझौते के तहत रूस से मदद मांगी। रूस ने भारत की सहायता के लिए प्रशांत महासागर मै तैनात चालीसवां बेडा भारत की सहायता के लिए भेजा जिसे 10TH ऑपरेटिव बैटल ग्रुप भी कहा जाता था। इसमें जहाज़ और परमाणु पनडुब्बी भी शामिल थे। साथ में रूस ने यमन से एयर सपोर्ट भी दिया था।

इंदिरा गाँधी की इस दूरदर्शिता का सभी ने लोहा माना।  इंदिरा गाँधी को यह अंदाज़ा था की भारत के लिए यह युद्ध लम्बा खींचना हितकर नहीं होगा क्योकि इंदिरा गाँधी की रणनीति में सिर्फ युद्ध जितना नहीं था। उन्हें बांग्लादेश को भी आज़ाद करना था। यह इंदिरा गाँधी की विदेश निति ही थी जिसके कारन भारत विजय हुआ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here