स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार पटेल की भूमिका को जानने के लिए खबर पर क्लिक करें

एक किसान को किसी भी चीज से डरने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि वह मिट्टी का एक बेटा है जिसने कठोर चट्टानों, जंगली जानवरों, भारी बारिश, ठंड, चिलचिलाती गर्मी और इतनी सारी बाधाओं के खिलाफ काम किया है

ये विचार है लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी जगह किसान आंदोलन से ही बनानी शुरू की और अपने कारनामों से महात्मा गांधी की भी नजर में आए।

खेड़ा संघर्ष

स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार पटेल ने सबसे पहली भूमिका खेड़ा संघर्ष में निभाई। गुजरात का खेड़ा खंड उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसान अकाल से मुश्किल में थे और यहां तक कि उन्हें खाने के लाले पड़े हुए थे। ऐसे विकराल हालात में किसानों ने अंग्रेज सरकार से टैक्स में छूट की मांग की, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने किसानों की इस मांग को निर्ममता से ठुकरा दिया।

जब यह मांग मंजूर नहीं हुई, तो सरदार पटेल एवं महात्मा गांधी ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कोई टैक्स नहीं देने के लिए प्रेरित किया। किसानों का यह संघर्ष रंग लाया और आखिरकार अंग्रेज सरकार को उनकी मांगों के आगे झुकना पड़ा। किसानों को उस साल टैक्स में राहत मिली। स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार पटेल की यह पहली कामयाबी थी।

बारडोली आंदोलन

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान साल 1928 में गुजरात में हुआ बारडोली आंदोलन, एक और ऐसा प्रमुख किसान आंदोलन था, जिसका नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया। उस वक्त प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान में तीस फीसदी तक इजाफा कर दिया था। पटेल ने किसानों को एक बार फिर अपने साथ लेकर, इस लगान वृद्धि का जमा कर विरोध किया। अंग्रेज सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए पहले तो कठोर कदम उठाए, लेकिन यहां भी आखिरकार उसे झुकना पड़ा। सरकार ने किसानों की सारी मांगें मान लीं। एक न्यायिक अधिकारी बूमफील्ड और राजस्व अधिकारी मैक्सवेल ने सारे मामलों की जांच कर तीस फीसदी लगान वृद्धि को गलत ठहराते हुए, इसे घटा कर 6.3 फीसदी कर दिया।

इस सत्याग्रह आंदोलन के सफल होने के बाद बारडोली की महिलाओं ने वल्लभ भाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की।

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